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निर्गुण गान समारोह : मालवी गायन ने मोह लिया दर्शकों का मन

 

भोपाल, 29 जून (हि.स.)। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में निराकार की संगीत उपासना पर केन्द्रित कार्यक्रम 'निर्गुण गान' के दूसरे दिन शुक्रवार शाम को संग्रहालय सभागार में 'मालवी गायन' की मनमोहक प्रस्तुतियां हुई, जिन्होंने दर्शकों को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया। इसके साथ ही समारोह में 'कबीर' अंतर्मन की आवाज पर केन्द्रित प्रस्तुतियों ने भी दर्शकों को भाव विभोर कर दिया।
संग्रहालय सभागार में शुक्रवार की शाम पहली प्रस्तुति में प्रेम सिंह दिपालपुरिया ने अपने साथी कलाकारों के साथ मालवी गायन की शुरुआत 'गुरु काटे करम की जड़' प्रस्तुत कर की। इसके बाद 'चमड़ा की पुतली भजन करले', 'जरा हल्की गाड़ी हांको', 'जहाँ देखूँ मैं तू का तू', 'प्रेम व्यास लग जावे गुरु जी' प्रस्तुत किया। प्रेम सिंह दिपालपुरिया ने अपनी प्रस्तुति के अंत में 'एसी मरी प्रीत निभाओ जो' और 'मन मस्त हुआ फिर क्या बोलें' प्रस्तुत कर सभी श्रोताओं को अपनी मालवी शैली से मोह लिया। इस प्रस्तुति में प्रेम सिंह दिपालपुरिया का साथ संगतकारों में तम्बूरे पर मोहन सिंह दिपालपुरिया ने, वायलिन पर संतोष सारोलिया ने ढोलक पर मनोहर सिंह ने राठौर ने, टिमकी पर मनोज कुमार घुडावद ने, करताल पर कृष्णा मोहन दिपालपुरिया ने और मंजीरे पर हरी ओम और अजय कुमार मालवीय ने दिया।
कार्यक्रम में इसके पश्चात् मैत्रेयी पहाड़ी के निर्देशन में नृत्याभिनय के साथ गायन की प्रस्तुतियाँ हुईं। इसकी शुरुआत 'कबीरा' से हुई। इसमें कथक नृत्य के साथ अंतर्मन के विभिन्न भावों को मंच पर प्रस्तुत किया गया। कबीरा का संगीत निर्देशन सरद चन्द्र श्रीवास्तव ने किया। कबीरा के पश्चात् लगभग 45 मिनट तक विधि शर्मा ने मंच पर अपने गायन में कबीर के विभिन्न दोहों को प्रस्तुत किया और साथ ही शल्जा नरवाडे, शिल्पा, मीरा, आकांक्षा, राजेश, अमित, नन्द कुमार और सुमित ने गायन के साथ ही मंच पर कथक और छाऊ नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मन्त्रमुग्ध कर दिया। इस प्रस्तुति में जीवन के विभिन्न चरणों और उपदेशों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। यह प्रस्तुति नृत्याभिनय और गायन के साथ मोक्ष पर समाप्त होती है। प्रस्तुति के दौरान गायन में विधि शर्मा ने मुख्य गायिका के रूप में सहयोग किया। इस प्रस्तुति का निर्देशन मैत्रेयी पहाड़ी ने किया और संगीत निर्देशन पंडित अजय परसन्ना ने किया। प्रस्तुतियाँ के दौरान श्रोताओं और दर्शकों ने कई बार कलाकारों का उत्साह वर्धन करतल ध्वनि से किया।
तीन दिवसीय कार्यक्रम के अंतिम दिन 30 जून को जगदीश बोरियाला द्वारा 'मालवी गायन' एवं लक्षमण दास द्वारा 'बाउल गायन' की प्रस्तुतियाँ संग्रहालय सभागार में सायं 6:30 से होंगी। कार्यक्रम में प्रवेश नि:शुल्क है।