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(नवरात्र पर लेख) सैनिकों की अटूट आस्था की प्रतीक तनोट माताः चंद्रशेखर भाटिया

 

जैसलमेर से करीब 130 किलोमीटर दूर स्थि‍त माता तनोट राय मंदिर पर इन दिनों नवरात्र मेला चल रहा है। यूं तो देश दुनिया का हर देवी मंदिर आस्था के मामले में कम नहीं है, पर तनोट माता मंदिर का महत्व देश की सुरक्षा और सैनिकों से जुड़ जान के कारण कुछ अधिक ही बढ़ जाता है। तनोट माता को देवी हिंगलाज माता का एक रूप माना जाता है। हिंगलाज माता शक्तिपीठ वर्तमान में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के लासवेला जिले में स्थित है। भाटी राजपूत नरेश तणुराव ने तनोट को अपनी राजधानी बनाया था। उन्होंने विक्रम संवत 828 में माता तनोट राय का मंदिर बनाकर मूर्ति को स्थापित किया था। भाटी राजवंशी और जैसलमेर के आसपास के इलाके के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी तनोट माता की अगाध श्रद्धा के साथ उपासना करते रहे। कालांतर में भाटी राजपूत ने अपनी राजधानी तनोट से हटाकर जैसलमेर ले गए परंतु मंदिर तनोट में ही रहा। तनोट माता का य‍ह मंदिर यहाँ के स्थानीय निवासियों का एक पूजनीय स्थान हमेशा से रहा। साल 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान जो चमत्कार देवी ने दिखाए, उसके बाद तो यह स्थल भारतीय सैनिकों और सीमा सुरक्षा बल के जवानों की श्रद्धा का विशेष केन्द्र बन गया।
जैसलमेर में भारत पाक सीमा पर बने तनोट माता के मंदिर से भारत पाकिस्तान युद्ध की कई अजीबोगरीब यादें जुडी हुई है। यह मंदिर भारत ही नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सेना के फौजियों के लिये भी आस्था का केन्द्र रहा है। सीमावर्ती जैसलमेर जिले में भारत पाक सीमा पर बना तनोट माता का मंदिर अपने आप में एक अद्भुद मंदिर कहा जाता है। जैसलमेर में पाकिस्तानी सीमा से सटे इस इलाके में तनोट माता का मंदिर यहां के लोगों की आस्था का केन्द्र तो है ही, भारत व पाक की पिछली लडाइयों का मूक गवाह भी है। 1965 के भारत पाक युद्ध से माता की कीर्ति और अधिक बढ गई जब पाक सेना ने हमारी सीमा के अन्दर भयानक बमबारी करके लगभग 3000 हवाई और जमीनी गोले दागे। आश्चर्य यह कि तनोट माता की कृृपा से किसी का बाल भी बांका नहीं हुआ। पाक सेना चार किलोमीटर अंदर तक हमारी सीमा में घुस आई थी पर युद्ध देवी के नाम से प्रसिद्ध इस देवी के प्रकोप से पाक सेना को न केवल उल्टे पांव लौटना पड़ा, बल्कि अपने सौ से अधिक सैनिकों के शवों को भी छोड़ कर भागना पड़ा। माता के बारे में कहा जाता है कि युद्ध के समय माता के प्रभाव ने पाकिस्तानी सेना को इस कदर उलझा दिया था कि रात के अंधेरे में पाक सेना अपने ही सैनिकों को भारतीय सैनिक समझ कर उन पर गोलाबारी करने लगी। परिणाम स्वरूप स्वयं पाक सेना द्वारा अपनी सेना का सफाया हो गया। इस घटना के गवाह के तौर पर आज भी मंदिर परिसर में 450 तोप के गोले रखे हुए हैं। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिये भी ये आकर्षण का केन्द्र है।
1971 के युद्ध में भी पाक सेना ने किशनगढ़ पर कब्जे के लिये भयानक हमला किया था, परन्तु 65 की ही तरह उन्हें फिर से मुंह की खानी पड़ी। माता की शक्ति को देखकर पाक सेना के कमाण्डर शहनवाज खां ने युद्ध समाप्ति के बाद भारत सरकार से माता के दर्शन की इजाजत मांगी व ढाई वर्ष बाद इजाजत मिलने पर शहनवाज खां ने माता के दर्शन कर यहां छत्र चढ़ाया। लगभग 1200 साल पुराने तनोट माता के मंदिर के महत्व को देखते हुए बीएसएफ ने यहां अपनी चौकी बनाई है। इतना ही नहीं बीएसएफ के जवानों द्वारा अब मंदिर की पूरी देखरेख की जाती है। मंदिर की सफाई से लेकर पूजा अर्चना और यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिये सुविधाएं जुटाने तक का सारा काम अब बीएसएफ बखूबी निभा रही है। वर्ष भर यहां आने वाले श्रद्धालुओं की जिनती आस्था इस मंदिर के प्रति है उतनी ही आस्था देश के इन जवानों के प्रति भी है, जो यहां देश की सीमाओं के साथ मंदिर की व्यवस्थाओं को भी संभाले हुए हैं।
तनोट माता के प्रति आम लोगों के साथ साथ सैनिकों की जबरदस्त आस्था है। श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामनाओं को लेकर दर्शन करने के लिये आते हैं और उन्हें पूरा होते थी देखते हैं। यह हिन्दू मुस्लिम एकता का भी प्रतीक है जिसका उदाहरण इस मंदिर के ठीक सामने स्थित पीर बब्ब की मज़ार है जिस पर सभी धर्मों के लोग और यहाँ आने वाले श्रद्धालु फूल चढाते हैं। हालांकि इस दरगाह को लेकर किसी को कुछ ज्यादा पता नहीं है, मगर इस दरगाह का यहाँ होना ही इस मंदिर के साम्प्रदायिक सौहार्द को दर्शाता है। इस मूल मंदिर के पास श्रद्धालुओं ने रूमालों का शानदार मंदिर बना रखा है जो देखते ही बनता है। इस मंदिर में आने वाला हरेक श्रद्धालु अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिये रूमाल अवश्य बांधते हैं और मनोकामनाओं की पूर्ति के बाद इसे खोलने के लिये भी आते हैं। इस प्रकार यहां प्रतिदिन आने वाले श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के कारण 50 हजार से भी अधिक रूमाल बंधे हैं। एक बात और कि भारत पाकिस्तान के बीच रिश्ते चाहे जैसे भी हो, एक दूसरे के जवान एक दूसरे के खून के प्यासे ही सही लेकिन इतनी कड़वाहट के बीच भी माता तनोट के इस मंदिर में सरहद व मजहब सभी फासले भुला कर लोग श्रद्धा के साथ सिर झुकाते हैं।

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