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सार

शराब बंदी से महिलाएं खुश तो पुरुष बता रहे बढ़ गया खर्च, अब मिल रही महंगी।

बाढ़ के दंश से हर साल जूझने वाले बिहार के लोगों के लिए रोजगार बड़ा मुद्दा।

विस्तार

बिहार के गली-कूचों में नेताओं के वादों-इरादों के बीच आम जनता की एक आवाज सबसे अधिक सुनाई देती है, लोगों का कहना है कि सड़क, बिजली और पानी तो मिला पर काम नहीं मिला। ‘अमर उजाला’ की चुनावी यात्रा के दौरान गांवों और शहरों में एक बात देखने को मिल रही है कि जाति-धर्म के खांचे में बंटे बिहार के लोगों ने जहां बाढ़ के साथ जीना भले सीख लिया हो, लेकिन लॉकडाउन में परदेस से लौटने के बाद अपने राज्य में काम न मिलने की टीस गहरी हुई है।


गोपालगंज से मोतिहारी जाते वक्त नेशनल हाइवे के दोनों तरफ कई जगहों पर भरा बाढ़ का पानी दूर-दूर तक दिखाई देता है। धान की खेती हुई नहीं, गेहूं बोने के लिए इन गांवों के लोगों को पानी सूखने का जनवरी तक इंतजार करना पड़ेगा। मोतिहारी के धनगढ़ा गांव के श्याम बाबू यादव बताते हैं, पिछले कई सालों में सड़क-बिजली और पीने का पानी की सुविधा बढ़ी है, लेकिन अगर यहां काम मिल जाता तो बाहर नहीं जाना पड़ता। कोरोना काल में लोग यहां आए तो, लेकिन काम न मिलने के कारण अब फिर मुंबई-दिल्ली जाएंगे। लॉकडाउन के दौरान बिहार में बेरोजगारी का मुद्दा काफी मुखर हुआ है, विपक्षी पार्टियां इसे लेकर नीतीश सरकार पर हमलावर हैं। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने भी युवाओं से उन्हें रोजगार देने का वादा किया है। लॉकडाउन में दूसरे राज्यों से आए काफी लोग गांवों में भटकते मिल जाएंगे जो समझ नहीं पा रहे क्या करें?

अब चेहरा बदलना चाहिए

हाजीपुर जिले के तिरसिया गांव में रहने वाले निरंजन राय बाढ़ से तीन महीने घिरे रहने के दौरान बदहाल सड़कें दिखाते हुए कहते हैं, नीतीश कुमार ने हमारे क्षेत्र में काम नहीं किया। वो तो मौका पाकर दूसरी पार्टी में भाग जाते हैं। इस बार प्रदेश के  मुख्यमंत्री का चेहरा बदलना चाहिए। किसी नए को मौका मिले। पास ही खड़े आनंद कुमार यादव भी निरंजन राय से सहमति दिखाते हुए कहते हैं, मौजूदा सरकार का हर मंत्री नेता भ्रष्टाचार में लिप्त है, लोग बदलाव चाहते हैं।


तिरसिया के ही विक्की  कुमार को हर रोज काम नहीं मिलता। वह युवाओं के बिहार से पलायन की मजबूरी को बताते हुए कहते हैं, यहां एक दिन काम मिलता है तो दस दिन बैठकर खाना पड़ता है। इसी बीच, पास में ही खड़े अवधेश भगत बोलते हैं कि हमारे गांव में काम के लिए नीतीश कुमार का पलड़ा भारी है, लेकिन वोट में तेजस्वी का। आखिर वोट तो जाति पर ही जाएगा। अरवल जिले के मुस्लिम पट्टी गांव से आकर पटना में जदयू दफ्तर के सामने टायर पंक्चर की दुकान चलाने वाले मो. असगर नीतीश सरकार के द्वारा किए गए कार्यों की तारीफ करते हुए कहते हैं, उन्होंने विकास के साथ-साथ जाति के मामले में भी बढ़िया काम किया है।

नेता लोगों को सिर्फ चमचों से मतलब  है, जनता की कोई नहीं सुनता

नाव लोगों के आने-जाने का अहम हिस्सा है। पिछले 25 साल से पटना के दीघा घाट पर नाव चलाने वाले मुताव राय कहते हैं कि सबसे बडी जरूरत एक पुल की है, जिससे उनके गांव के लोग शहर की ओर आसानी से आ-जा सकें। गंगा नदी पार कराने के बाद नाव को किनारे लगाकर लोगों से उतराई में पांच-पांच रुपया वसूलते हुए मुताव राय बोलते हैं, अगर पुल बन जाए तो हमारे गांव की दिक्कत दूर हो जाए। नेता लोगों को सिर्फ चमचों से मतलब है, जनता की कोई नहीं सुनता।


शराब बंदी से महिलाएं खुश पर पुरुष नाराज

बिहार में शराब बंदी एक बड़ा मुद्दा रहा है, नीतीश कुमार इसे अपनी बड़ी उपलब्धि मानते हैं और महिलाएं खुश भी हैं, तो पुरुषों को लगता है इससे कोई फर्क नहीं पड़ा है। सरकार को राजस्व का नुकसान हो रहा है और आम आदमी को अधिक पैसे  खर्च करने पड़ते हैं। धनगढ़ा गांव में रहने वाले श्याम बाबू कहते हैं, दारू बंद कहां है, बाहर से आती है, गरीब आदमी देशी पीकर मर रहा है, सरकार को इसे शुरू कर देना चाहिए। इससे सरकार और जनता दोनों को नुकसान है।


वहीं शमीना कहती हैं कि 'दारू बंद होने से हम लोगों की जिंदगी बढ़िया हो गई है, गांव-घर के लड़ाई झगड़े बंद हो गए हैं।’ पटना में चाय की दुकान चलाने वाली गुड़िया अपनी सभी दिक्कतों के बावजूद खुश हैं कि बिहार में दारू नहीं बिक रही। पटना में ही सब्जी और फल की दुकान पर बैठी राधा दारू बंद होने से अपनी जिंदगी में आए सुकून को बताते हुए थोड़ी और मांग करती हैं, जैसे दारू बंद हो गई वैसे ही गांजा-भांग भी बंद होनी चाहिए। इससे और सुधार होगा। राधा देवी के पास ही खड़े विकास कुमार कहते  हैं, आज के 15-20 साल पीछे जाएं तो जो मेरी बहन और मां दस बजे के बाद पटना की रोड पर नहीं दिखती थीं, अब 12 बजे तक दिखती हैं, लिहाजा हालात तो सुधरे हैं।

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