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सार

  • जांच एजेंसियों को चकमा देने को संक्रमितों ने खाई पेरासिटामोल की गोली
  • देश के 21 अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों समेत अन्य स्थानों पर शुरू में थी थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था  
  • संभावित संक्रमितों की बेतहाशा बढ़त ने किया है लॉकडाउन को मजबूर
  • विशेषज्ञों की अपील, जांच कराने को खुद सामने आएं लोग

विस्तार

डॉक्टर और वैद्य से कुछ नहीं छिपाना चाहिए, लेकिन कोरोना संक्रमितों ने इस कहावत का पालन नहीं किया और इसकी कीमत अब पूरे देश को चुकानी पड़ रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अफसर ने भी माना कि कोरोना संक्रमितों ने देश को चकमा देकर सबकी मुसीबत बढ़ाई है।

नार्थ दिल्ली मेडिकल कालेज के प्रो. डा. राम का भी कहना है कि देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या में तेजी बढ़ोतरी के पीछे कुछ इसी तरह के कारण हैं। पूरे देश में कर्फ्यू जैसे बने हालात भी इसी का नतीजा हैं।

पैरासिटामॉल की गोली खाई और चकमा दे दिया

भारत ने दुनिया के कई देशों में कोरोना वायरस के संक्रमण को देखते हुए अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने का फैसला किया। इसके लिए नई दिल्ली ने एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर तैयार किया। विदेश मंत्रालय ने भी संबंधित देशों से संपर्क साधा और नागरिकों को निकालने के लिए व्यवस्था की गई।

इसके साथ-साथ जनवरी, फरवरी में तमाम नागरिक अनेक देशों से खुद की पहल पर भारत आए। विदेशों से आने वाले अपने या विदेशी नागरिकों की जांच के लिए भारत ने देश के 21 अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों समेत अन्य स्थानों पर थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था शुरू की।

इसके अंतर्गत तय किया गया कि जो भी कोरोना के संक्रमित मिलेंगे या संदेहास्पद मिलेंगे उन्हें क्वारंटीन किया जाएगा और रिपोर्ट निगेटिव आने पर ही छोड़े जाएंगे। लेकिन भारत आने वाले लोगों ने इसका भी तोड़ निकाल लिया।

उन्होंने रास्ते में पैरासिटामॉल या इससे मिलती-जुलती दवाएं खा लीं। नतीजतन हवाई अड्डे की जांच में पास हो  गए। हवाई अड्डे से सीधे अपने घर या अपने इलाके में चले गए और जहां भी गए, लोगों को संक्रमित करते चले गए।

चौंकाता है यह आंकड़ा

भारत में पिछले तीन महीने के भीतर का रिकार्ड काफी चौंकाने वाला है। पहले एक लाख संभावित संक्रमितों के मामले सामने आने में 45 दिन लग गए। लेकिन अगले एक लाख लोगों की संख्या महज 10 दिन में सामने आई। इसके बाद तीसरे चरण के अगले एक लाख लोगों की संख्या महज तीन दिन में सामने आ गई।

आसार ऐसे बन रहे हैं कि हर 24 घंटे के अंतराल पर एक-एक लाख ऐसे लोग आ सकते हैं, जिनके कोरोना संक्रमित होने की संभावना के मद्देनजर उनको जांच प्रक्रिया से गुजारने की स्थिति बनने लगे।

माना जा रहा है कि इस तरह से बढ़ रही खतरनाक स्थिति को देखते हुए ही केंद्र सरकार और राज्यों की सरकार ने आपात स्थिति घोषित करने, जनता कर्फ्यू लगाने या आंशिक लॉकडाउन और फिर पूर्ण लॉकडाउन करने का फैसला ले लिया।

माना जा रहा है कि 31 मार्च तक के संकेतों में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले समय में स्थिति भयावह हो सकती है।

चकमा नहीं, व्यवस्था का साथ दें

आईसीएमआर के डा. रमन गंगाखेड़कर हों या दिल्ली सरकार के डा. रहेजी, प्रो. डा. राम या फिर डा. अश्विन चौबे, सबकी सलाह एक ही है। सभी चिकित्सकों का कहना है कि देश के नागरिकों को जिम्मेदारी भरा व्यवहार करना चाहिए। वह मर्ज को छिपाकर न केवल खुद अपनी, बल्कि परिवार, आस-पड़ोस के लोगों की जान खतरे में डाल रहे हैं।

लोगों को क्वारंटीन के लिए खुद आगे आना चाहिए। चिकित्सकों की सलाह का पालन करें और सहयोग दें। डा. राम और डा. अश्विन चौबे का कहना है कि लोगों के समझदार साथ देने के दम पर ही कोरोना जैसे संक्रमण पर काबू पाया जा सकता है।

डा. अश्विन चौबे का कहना है कि जितने भी संभावित मामले आए हैं, उनमें सभी को कोरोना का संक्रमण नहीं है। तीन दर्जन के करीब लोग ठीक भी हुए हैं। यह सहयोग से ही हो सका है।

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