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सरकारी शिक्षण संस्थानों में सीटें बढ़ाकर सवर्ण गरीबों का 10 फीसदी आरक्षण लागू करेगी सरकार

नई दिल्ली। गरीब सवर्णों को नौकरी व शिक्षण संस्थानों में 10 प्रतिशत आरक्षण देने से संबंधित बिल संसद के शीतकालीन सत्र में पास होने के बाद केन्द्र सरकार के शिक्षण संस्थानों में इस कोटे के छात्रों के एडमिशन के लिए 10 प्रतिशत सीटें बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय में इसके लिए 10 जनवरी को एक बैठक हुई थी। इसमें मुख्य मुद्दा आगामी शैक्षणिक सत्र से इसे लागू करने में आ रही दिक्कतों से निबटने का था। क्योंकि आईआईटी, आईआईएम व ऐसे अन्य सरकारी शिक्षण संस्थानों में एडमिशन के लिए जो प्रवेश परीक्षाएं हुई हैं(जेईई मेन व कैट) या हो रही हैं, उनके लिए जो फार्म भरवाए गये हैं, उनमें आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए कोई कालम नहीं था। बैठक में इस पर भी विचार हुआ कि सवर्णों को आरक्षण वर्तमान कुल आरक्षण कोटा 49.5 प्रतिशत में से ही दिया जाए या अलग से। वर्तमान 49.5 में से देने पर, इसमें से 9.5 प्रतिशत सीटें सवर्ण गरीब छात्रों को देना होगा। यह होने पर ओबीसी,एससी-एसटी के छात्रों के लिए आरक्षित सीटों मे से 9.5 प्रतिशत कटौती करनी पड़ेगी। यह करने पर ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित आरक्षण की अधिकतम सीमा 49.5 प्रतिशत के भीतर रह सकते हैं। यदि 49.5 प्रतिशत से अलग गरीब सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण देते हैं, तो कुल आरक्षण 59.5 प्रतिशत हो जाएगा। इसके विरूद्ध सामान्य वर्ग के छात्र सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकते हैं ( वैसे भी इस आरक्षण के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में 10 जनवरी को एक याचिका दायर हो गई है) । शैक्षणिक संस्थानों व नौकरियों में कुल सीटों का मात्र 49.5 प्रतिशत ही कुल आरक्षण के लिए आरक्षित है। बची 50.5 प्रतिशत सीटें सामान्य वर्ग के लिए हैं। ऐसे में सबसे आसान रास्ता ऐसे सभी संस्थानों में आगामी शैक्षणिक सत्र में 10 प्रतिशत सीटें बढ़ाकर गरीब सवर्णों को आरक्षित कोटे में एडमिशन देने का है। ऐसा ही 2008 में अन्य पिछड़े वर्ग के लिए 27 प्रतिशत कोटा लागू होने पर किया गया था। उस समय शिक्षण संस्थानों में 54 प्रतिशत सीटें 6 वर्ष के लिए बढ़ा दी गईं थीं। इसी तरह से गरीब सवर्ण छात्रों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए 10 प्रतिशत सीटें 6 वर्ष के लिए बढ़ाई जा सकती हैं। बाद में शिक्षण संस्थानों का आधारभूत ढांचा बढ़ाकर उतनी सीटें हमेशा के लिए बरकरार कर दी जाएगी| जो संस्थान ऐसा नहीं कर पाएंगे वहां जितनी सीटें रहेंगी उसमें ही स्थिति के अनुसार कुछ व्यवस्था की जाएगी। बैठक में एक सदस्य ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए परिवार की आमदनी 08 लाख रुपये से कम होने के मानक को और कम किये जाने की जरूरत बताया। उनका तर्क था कि जब तक इसे 04 लाख के लगभग या उससे भी कम नहीं किया जाएगा, तब तक वास्तविक गरीब सवर्णों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाएगा। लेकिन अन्य सदस्यों ने यह तर्क देकर कि जब ओबीसी व दलितों के आरक्षण में क्रिमीलेयर की क्राइटेरिया 08 लाख रुपये निर्धारित है ,तो गरीब सवर्णों के मामले में भी उसे ही लागू रखना चाहिए। यदि शिक्षण संस्थानों में एडमिशन के लिए इसे कम किया गया तो इस पर विवाद हो जाएगा ।

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