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मेरे शहीद पिता चाहते थे राम जन्मभूमि पर मंदिर बने, मैं भी वही चाहता हूं : सुभाष

अयोध्या पैकेज के साथ ... अयोध्या, 06 दिसम्बर (हि.स.)। छह दिसम्बर 1992 में विवादित ढांचा विध्वंस हुए आज, गुरुवार को पूरे 26 साल हो गए। ये एक ऐसी घटना है जिसे विश्व हिंदू परिषद (विहिप) पूरे देश में शौर्य दिवस के रूप में मनाती है। 06 दिसम्बर 1992 को देशभर से अयोध्या आए कारसेवकों की लाखों की भीड़ ने विवादित ढांचे को ढहा कर टेंट में रामलला का दरबार सजा दिया। इस घटना की प्रतिक्रिया में देश के कई हिस्सों में हिंसक घटनाएं घटित हुई। अयोध्या में कारसेवा में शहीद हुए कारसेवकों के बड़े हो गये बच्चों के मन में भी कारसेवकों की भांति राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण की आशा बनी हुई है। 
अयोध्या के दिगम्बर अखाड़े के पास कारसेवा में शहीद हुए रमेश पाण्डेय का निकट ही रानी बाजार चौराहे पर घर था|उनकी मौत कारसेवा में पुलिस की गोली लगने से हुई थी। उस समय उनका बड़ा बेटा सुभाष पाण्डेय महज दस साल का था। 'हिन्दुस्थान समाचार' से गुरुवार को बातचीत में सुभाष ने कहा कि ‘मैं नहीं जानता कि ढांचे की चोटी पर चढ़ने की कोशिश के कारण उन्हें गोली मारी गई थी या मौत की कोई और कोई वजह थी। उस समय मैं छोटा था। ये बात मैं कभी पता नहीं कर सका। फिर भी मुझे याद है कि उनके अंतिम संस्कार के दौरान प्रदर्शन किया जा रहा था। उनके शरीर पर गोलियों के निशान थे।’
सुभाष ने कहा कि विवदित ढांचे को ढहाने की कोशिश में 30 अक्टूबर और दो नवम्बर, 1990 को पुलिस ने कारसेवकों पर गोलीबारी की थी। राम मंदिर बने ये सभी हिंदू चाहते हैं। मेरे पिता भी चाहते थे कि जन्मभूमि पर राम मंदिर बने। मैं भी यही चाहता हूं। उन्होंने कहा कि मैं जानता हूं कि पिता की मौत के बाद हमने बुरी हालत में जिंदगी गुजारी है। उनकी मौत उस चीज के लिए हुई जिसमें उनका विश्वास था। मंदिर का निर्माण करना ही होगा। 
सुभाष परिवार को चलाने के लिए पढ़ाई दसवीं तक करने के बाद छोड़कर अब विश्व हिंदू परिषद की गौशाला के बाद रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण की कार्यशाला में काम करते हैं। उसी के पारिश्रमिक से उनके परिवार का खर्च चलता है। वह विहिप के प्रति एहसानमंद होकर मंदिर निर्माण में सहभागी बने हुए हैं। 

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