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ब्रिटेन से दुनियाभर में फैले कोरोना के नए स्ट्रेन वीयूआई- 202012/01 पर टीके के असरदार होने की वैज्ञानिक पुष्टि कर चुके हैं। इसके उलट दक्षिण अफ्रीका में मिले स्ट्रेन 501वीयू और 484के के खिलाफ वैक्सीन के असर की पुष्टि नहीं हो रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वायरस जब अपने प्रोटीन की संरचना में बदलाव करता है तो शरीर टीका लगने के बाद भी उसे पहचान नहीं पाता है। इस कारण कोरोना के नए स्ट्रेन में संक्रमण का खतरा हो सकता है।



चिंताजनक: दक्षिण अफ्रीकी स्ट्रेन के प्रोटीन में बदलाव से वैक्सीन के अवसर में कमी संभव 

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ वैज्ञानिक वन मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर सर जॉन बेल बताते हैं कि कोरोना वैक्सीन शरीर की रोग प्रतिरोधक तंत्र को पैथोजन से लड़ने के लिए प्रशिक्षित करती है। वैक्सीन एंटीबॉडीज प्रोटीन बनाती है और उसे संरक्षित करती है जिससे भविष्य में वह उस तरह के वायरस के संपर्क में आने पर उससे लड़ाई शुरू कर सकें।



अगर वायरस ने म्यूटेशन कर लिया तब वैक्सीन के प्रोटीन को नहीं पहचान पाएगी और व्यक्ति दोबारा संक्रमित हो जाएगा। ऐसे में दक्षिण अफ्रीकी स्ट्रेन की चपेट में आने वालों पर वैक्सीन का असर मुश्किल लग रहा है। क्योंकि वायरस के इस स्ट्रेन ने अपने प्रोटीन में बदलाव किया है।


अधिक संक्रामक स्ट्रेन वैक्सीन के लिए खतरा

प्रोफेसर जॉन बताते हैं कि वायरस के दक्षिण अफ्रीकी स्ट्रेन के प्रोटीन में बदलाव चिंताजनक है। वैक्सीन ब्रिटेन के स्ट्रेन के खिलाफ काम करेगी लेकिन दक्षिण अफ्रीकी स्ट्रेन के खिलाफ क्या करेगी इस बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। इसको लेकर सवाल जस का तस खड़ा हुआ है। कई वैज्ञानिकों का कहना है कि नाइजीरिया में भी कुछ ऐसे ही स्ट्रेन हैं जो अधिक संक्रामक हैं। 


दूसरे देशों को अब अधिक सतर्क रहना होगा

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में जेनेटिक्स इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रोफेसर फ्रांकोइस बैलॉक्स का कहना है कि दुनिया के सभी देशों को अधिक सावधानी बरतनी होगी।दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटेन, ब्राजील जैसे देशों से अपने यहां आने वाले लोगों का कोरोना वायरस जांच के साथ जीनोम सीक्वेंसिंग करानी होगी। इसका लाभ यह होगा कि समय रहते इस वायरस के नए रूप की पहचान हो सकेगी। अगर ऐसा करने में कोई विफल रहता है तो इसका सीधा असर टीकाकरण की तैयारी पर पड़ेगा।


वायरस ने अपने प्रोटीन में किया बदलाव

प्रोफेसर जॉन का स्पष्ट कहना है कि संभव है कि दक्षिण अफ्रीकी स्ट्रेन के खिलाफ वैक्सीन बेअसर हो जाए। वायरस का दक्षिण अफ्रीकी स्ट्रेन ब्रिटेन के कैंट में मिले स्ट्रेन से ज्यादा चिंताजनक है। ऐसा इसलिए क्योंकि ब्रिटेन में इसके दो मामले मिले हैं और पाया गया है कि वायरस ने अपने प्रोटीन संरचना में काफी बदलाव कर लिया है जिससे वैक्सीन उसके खिलाफ बेअसर हो सकती है। प्रो. जॉन की ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका वैक्सीन को तैयार करने में अहम भूमिका है।


जांच से नए स्ट्रेन की पहचान मुश्किल

यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के सेल्यूलर माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉक्टर साइमन क्लार्क बताते हैं कि आरटी-पीसीआर से वायरस के एस जीन, एन जीन व ओआरएस 1एवी जीन की पहचान होती है। ब्रिटेन के स्ट्रेन में एस जीन है। इससे स्पष्ट है कि जिसमें वायरस के सिर्फ दो जीन मिल रहे हैं उसमें नया स्ट्रेन है। संक्रमित के सैंपल में तीनों जीन हैं। मतलब वो पुराने वाले स्ट्रेन से संक्रमित है। दक्षिण अफ्रीकी के स्ट्रेन में तीन जीन हैं इससे नए स्ट्रेन को पहचानना बहुत ही मुश्किल है।


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