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मोदी से कैप्टन की नजदीकी गुल खिलाएगी !

कैप्टन अमरिंदर सिंह कुर्सी से क्यों गए, इसके बजाय बड़ा सवाल यह है कि वे अब आगे क्या करेंगे। एक बात तो फिलहाल तय है कि उन्होंने नवजोत सिंह सिद्धू को किसी भी हाल में स्वीकार नहीं करने का मन बना लिया है। सिद्धू को पंजाब के मुख्यमंत्री बनाये जाने की संभावना पर कैप्टन अमरिंदर सिंह का तेवर बहुत कुछ कह जाता है। सीएम पद से इस्तीफे के बाद एक जगह कैप्टन ने कहा, "पाकिस्तान का प्रधानमंत्री इसका (सिद्धू का) दोस्त है और जनरल बाजवा के साथ इसकी दोस्ती है। सिद्धू तो बाजवा के साथ है, इमरान खान के साथ है। रोज हमारे कश्मीर में जवान मारे जा रहे हैं। आपको लगता है मैं सिद्धू के नाम को स्वीकार करूंगा ?" साथ ही चुनाव लड़ने के सवाल पर वे बड़ी लड़ाई की बात करते हैं- जब तक पंजाब सुरक्षित नहीं हो जाता, तब तक लड़ूंगा। साफ बात है कि वे देश की सुरक्षा की बात कर रहे हैं। पाकिस्तान से खतरों की बात कर रहे हैं और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री एवं सेना के जनरल से सिद्धू की कथित मिलीभगत की बात कर रहे हैं। इस बहाने वे सिद्धू से खतरे की बात कर रहे हैं।

सिद्धू पंजाब और देश के लिए कितने मुफीद हैं, अभी तो इसका हिसाब कैप्टन अमरिंदर सिंह के ही पास है। यह जरूर याद करना चाहिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा के दुश्मन हों अथवा उनकी खुद की राजनीति के, कैप्टन उन्हें छोड़ते नहीं हैं। राजनीति के लिए उन्होंने 1965 में सेना से वापसी कर ली थी, पर भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू होने पर अपने कर्तव्य निभाने मोर्चे पर लौट गए। वैसी बहादुरी वे राजनीति में कितना दिखा पाएंगे, वक्त बताएगा। उन्होंने एकबार पहले भी कांग्रेस छोड़ी, नई पार्टी भी बनाई। इस बार क्या करेंगे, अभी पता नहीं, पर रुख उनका कड़ा बना हुआ है।

अमरिंदर सिंह सिर्फ सिद्धू से ही नाराज नहीं हैं, कांग्रेस नेतृत्व से भी खफा हैं। वे याद करते हैं कि करीब 52 साल से राजनीति में हैं, पर समझ नहीं पाए कि दो महीने के अंदर दो बार पंजाब के विधायकों को दिल्ली में बुलाने के बाद तीसरी बार विधायक दल की बैठक क्यों हो रही है। फिर वे विधायक दल के नेता हैं और उन्हें बैठक के बारे में जानकारी तक नहीं है। अमरिंदर सिंह ने जोड़ा कि इससे वे ‘ह्यूमिलिएट फील’ कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि नेतृत्व को उन पर भरोसा नहीं है।

तो पंजाब में सिद्धू से लेकर दिल्ली में कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व तक से नाराज कैप्टन अब आगे क्या करेंगे। अनुभवी अमरिंदर ने इस पर सोचना निश्चित ही शुरू कर दिया है, पर अपने पत्ते वे बहुत जल्द खोलना नहीं चाहते। हर संभावना को तोल-मोल कर देखेंगे। कैप्टन की उम्मीदें कई हैं, उनसे भी उम्मीद लगाने वाले इंतजार में हैं। आखिर विधानसभा चुनाव के दिन जो आ गए हैं। अव्वल तो मुख्यमंत्री की कुर्सी जाने के बाद वे अभी कांग्रेस के अंदर ही कुछ दिन तक अपना वजन तोलेंगे, बात नहीं बनी तो बाहर मोल लगवाएंगे। एक बार पहले कैप्टन अकाली दल में रह चुके हैं। इस बार किसानों के सवाल पर उन्होंने अकाली दल से बढ़त ली है। राज्य में उभर रही आम आदमी पार्टी से कभी नजदीकी दिखाने वाले पंजाब के निवर्तमान हो चले मुख्यमंत्री की कुछ दिनों से पट नहीं रही। आप नेता मुख्यमंत्री पर लगातार हमलावर रहे हैं। इस अर्थ में देखना होगा कि बीजेपी से कैप्टन की नजदीकियों की क्या संभावना है।

कांग्रेस में हर तरह से मजबूरी दिखने की स्थिति में अमरिंदर सिंह भारतीय जनता पार्टी के नजदीक दिखें, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उन्होंने सिद्धू के बहाने राष्ट्रीय सुरक्षा की जोरदार जरूरत बतायी है। यहां देखें तो उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी के करीब जाने से परहेज नहीं किया है। याद करना होगा कि जुलाई, 2019 में भी उन्होंने नरेन्द्र मोदी सरकार की तारीफ की थी। तब पंजाब के कांग्रेसी सीएम ने अलगाववादी संगठन सिख्स फॉर जस्टिस (एसएफजे) पर प्रतिबंध लगाने के सरकार के कदम की जमकर सराहना की थी। अमरिंदर ने कहा था कि केंद्र सरकार ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई समर्थित इस संगठन पर रोक लगा कर देश की सुरक्षा के लिए बड़ा कदम उठाया है। कैप्टन का यह रुख बाद में भी कायम रहा।पार्टी लाइन से अलग हटकर भी उन्होंने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा की है।

जलियांवाला बाग पुनरुद्धार मामला इसका ताजा उदाहरण है। जहां कांग्रेस ने भाजपा पर इतिहास को मिटाने का आरोप लगाया, वहीं, अमरिंदर सिंह ने इस कार्य के लिए मोदी सरकार को साफ तौर पर सराहा। उन्होंने इस पुनर्निर्माण के उद्घाटन कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया और जलियांवाला बाग को पहले से बहुत बढ़िया बताया था। अमरिंदर सिंह ने कभी प्रधानमंत्री से मुलाकात में भी परहेज नहीं किया। कृषि कानूनों पर भी पीएम से मिलकर उन्होंने इन्हें वापस लेने की मांग की थी। अलग बात है कि उस दौरान भी वे विपक्ष के अन्य नेताओं की तरह मोदी पर हमलावर नहीं रहे।

साफ है कि कैप्टन ने ताजा घटनाक्रम में बीजेपी में जाने से इनकार नहीं किया है। अमरिंदर ने पहले भी 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में अपनी उपेक्षा पर भाजपा के साथ जाने का मन बना लिया था। इसका खुलासा उन्होंने स्वयं किया था। बहरहाल, अभी इस बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी, पर कांग्रेस के कई बड़े नेता उनसे पहले भी भाजपा में जाकर एक बेहतर विकल्प बना चुके हैं।

(लेखक डॉ. प्रभात ओझा  ‘हिन्दुस्थान समाचार’ में न्यूज एडिटर हैं।)


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