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Hriday Narayan Dixit

संसार क्षण भंगुर है

घर प्राचीनकाल से मनुष्य की जिज्ञासा रहे हैं। हमारा गाँव नदी के किनारे है। नदी तट पर तमाम तरह के पेड़ थे। इन पेड़ों पर पक्षी अपना घर बनाते थे। इसे घोंसला कहते हैं। तिनका लाकर घर बनाना गहन स्थापत्य की सूचना है। अनेक जीव जमीन में बिल खोदकर रहते हैं। अनेक पक्षी और और जीव घर नहीं बनाते हैं। उन्हें भी आत्मरक्षा की चिन्ता परेशान करती है। वह इधर-उधर ताक-झाँक कर अपना रैनबसेरा तय कर लेते हैं। घर सबकी प्रीति है।

मनुष्य का सामान्य जीवन प्राचीनकाल में घुमन्तू था। घने जंगल या नदी तट पर पेड़ों के झुरमुट में रात हुई। वहीं घर बने। ऐसे घर घास-फूस के थे। घर अल्प समय में छूट जाते थे। रात गयी, बात गयी। मनुष्य आगे की यात्रा पर निकल पड़े। जहाँ रात आई वहीं घर। मनुष्य खेती से परिचित हुआ। उसे स्थायी घर की जरूरत पड़ी। खेती के लिए उसका निकट का निवास जरूरी हो गया। नदी के किनारे छोटे-छोटे घास-फूस के घर बनने लगे। गृह निर्माण की कथा लम्बी है। इसका विकास धीरे-धीरे हुआ है। पहले घर बने थे, कृषि और आत्मरक्षा के लिए। बाद में वह प्रतिष्ठा के सूचक भी बने। जिसका जितना बड़ा घर उसकी उतनी प्रतिष्ठा। ऋग्वेद और अथर्वेद में सुन्दर घर की अभिलाषा है। ऋषि को वरूणदेव से शिकायत है। उनका घर सैकड़ों खम्भों वाला बताया गया है। ऋषि कहते हैं कि आप हमको वैसा ही सुन्दर घर दें।

अथर्वेद में सुन्दर घर का उल्लेख है। इस घर में सभी दिशाओं से वायु प्रवेश करती है। ऋषि की प्रार्थना है कि गाय और उसके बच्चे घर में सर्वत्र घूमे। सांझ समय सबकी इच्छा घर लौटने की होती है। सूरज भी संध्याकाल में घर जाने के लिए अस्त होते हैं। हमारा शरीर भी घर है। वृद्धावस्था में जीवन की संध्या आती है। शरीर घर जाने की तैयारी करता है। शरीर के भीतर प्राण है। प्राण आत्मा धीरे-धीरे घर छोड़ने की तैयारी करते हैं। भौतिक जगत में शरीर ही वास्तविक घर है। प्राण गये शरीर नाम का घर शिथिल हो गया। पंचतत्व का विसर्जन हुआ। प्राण किसी नए घर के शोध में अधिकांश मनुष्यों का पूरा जीवन घर बनाने में ही चला जाता है।

लेबनानी दार्शनिक खलील जिब्रान ने बड़े घरों पर खूबसूरत टिप्पणी की है। उन्होंने लिखा है, दुनिया के सभी घर बौने लोगों ने बनाए हैं। खलील की बात सही भी लगती है। मनुष्य का शरीर घर है। शरीर उसकी सीमा है। वह इस सीमा से संतुष्ट नहीं होता। बड़े घर बनाता है। घर हमारे तमाम कर्तव्यों के पालन का भी स्थान है। पति-पत्नी गहन प्रेम में जीवन-यापन करते हैं। बच्चों के पालन-पोषण का प्रबन्ध करते हैं। घर सुन्दर बन जाता है। वृद्ध हो गये असक्त परिजनों की सेवा करते हैं, तब घर और भी सुन्दर हो जाता है। अतिथि घर में आदर पाते हैं। घर और आकर्षक हो जाते है।

घर कभी-कभी दुखी भी करते हैं। मैंने कहीं पढ़ा है कि एक व्यक्ति गृह कलह से परेशान थे। घर में झगड़े झंझट थे। वह अशान्त मन के साथ एक होटल में पहुंचा। होटल के प्रबन्धक से पूछा कि आपके यहाँ क्या-क्या सुविधाएँ हैं। होटल मालिक ने कहा आपका स्वागत है। होटल में घर जैसी सारी सुविधाएँ हैं। घर पीड़ित व्यक्ति भागा। मैनेजर ने हाथ जोड़े और पूछा कि सर क्या गलती हो गयी है। घर पीड़ित व्यक्ति ने कहा कि मैं घर से ही परेशान होकर होटल में आया हूं। यहाँ भी घर जैसी सुविधाएँ हैं, इसलिए मैं भाग रहा हूँ। घर खूबसूरत बनते हैं, रिश्तों के कारण। घर की परिभाषा कठिन है। मैं अपने अनुभव से कहता हूँ। जहाँ बार-बार लौटने का मन करे, वही घर है। यह केवल कंक्रीट-सीमेंट का ढाँचा नहीं। घर परिवार में आत्मीयता ही अपरिहार्य है। ऐसे घर में गृह कलह नहीं होती।

महानगरों के घर अनावश्यक वृहदाकार होते हैं। तमाम बड़े लोग घर की छत से हेलीकाप्टर उड़ाने का भी प्रबन्ध करते हैं। महानगरों का भू-क्षेत्र घट रहा है। 20-30 तलों वाले घर बन रहे हैं। वृद्ध ऐसे ऊँचे घरों में एकाकीपन की व्यथा झेलते हैं। बच्चे उन्हें छोड़कर अपनी रोजी में लगे रहते हैं। उन्हें घर का आनन्द नहीं मिलता। यह विश्व भी एक बड़ा घर है। भारतीय चिंतन में धरती को वसुधैव कुटुम्बकम कहा गया है। पृथ्वी को एक परिवार जानना भारतीय संस्कृति का स्वप्न है। लेकिन आधुनिक समाज में घर टूट रहे हैं। घरेलू झगड़ों के कारण परिवार बिगड़ रहे हैं। एक घर के भीतर कई घर हैं। परिवार में परस्पर संवाद नहीं है। नगरों-महानगरों में पड़ोस के घरों से परिचय भी नहीं है। कोई संवाद नहीं। दुख-सुख का साझा नहीं। सब एकाकी है।

घर प्रत्येक मनुष्य का भौतिक विस्तार है। यह संस्कारशाला होता है। घर एक सुन्दर पाठशाला भी है। घर के बड़े वरिष्ठ प्रीति प्यार के वातावरण में पुत्र-पौत्रों को जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र देते रहते हैं। परिवार के एक सदस्य का दुख-सुख सारे सदस्य बाँट लेते हैं। पश्चिम का जीवन व्यक्तिगत है। भारत का लोक जीवन सामूहिक है। भारत के लोग सामूहिक जीवन में रस, आनन्द प्राप्त करते हैं। घर सारे कर्मों प्रकृति और समाज के प्रति हमारे दायित्वों का केन्द्र है। ऋग्वेद में कहा गया है कि ”हम पहले घर को भद्र बनाए। फिर वाणी को भद्र बनाएं। फिर सभा में भद्र बोलें। हमारा आचरण भद्र हो।“

हमारे विचार-विमर्श के केन्द्र भी भद्र हों। भारत में सुन्दर घरों का निर्माण वैदिक काल में ही शुरू हो गया था। महाभारत में भी सुन्दर घरों की चर्चा है। घर प्रत्येक जीव का आश्रय है। हमारा जीवन घर बदलू रहा है। शिशु अवस्था में माँ का आँचल घर जैसा। थोड़ा चले। गिरे। रोए। माँ ने उठा लिया, आँचल में छुपाया। हम प्रसन्न। फिर खरपतवार का घर हमारी आश्वस्ति बना। पढ़ाई के लिए शहर चला। शहर में बहुत छोटा घर किराए पर लिया। पढ़ाई पूरी हुई। फिर काॅलेज में नौकरी मिली। घर बदला। विधायक हुआ। फिर नया घर। यह सरकारी घर था। मंत्री हुआ। विशाल घर मिला। चार बार जीतने के बाद हार गया। सरकारी घर छूट गया। घर बदल गया। कुछ समय बाद फिर से पद आया। फिर सरकारी घर मिल गया।

पीछे सप्ताह तक विधानसभा अध्यक्ष के रूप में बहुत बड़ा घर था। अब यह भी छूट गया। यहाँ मैना थी। चिड़ियों के झुण्ड थे। कोयल संगीत यंत्रों के बिना ही गाती थी। हम उसका गायन नहीं सुन सकेंगे। गौरैया की निर्दोष आंखें भूलती नहीं। तोता आमला के फल पर चोंच मारते थे। आमला गिरते थे। जामुन के फल जमीन पर गिरते ही टूट जाते थे। जमीन रंग जाती थी। हमारे सहयोगी अजय ने पाँच बिल्लियाँ पाल रखी हैं और प्रेम पगी कुतिया भी। यह सब छूट रहा है।

संसार क्षण भंगुर है। जामुन आमला का जीवन भी ऐसा ही है। हमारे सरकारी घर का वातावरण मेरे मन में है। घर की ऊंची दीवारें मेरे लिए बेमतलब हैं। लेकिन यहाँ के पक्षियों की बोली और वनस्पति जगत का वातावरण मैं अपने साथ लेकर नए घर जा रहा हूँ। आखिरकार गौरैया, कोयल, तोता, मैना और बिल्ली की म्याऊं की बोली कैसे छोड़ी जा सकती हैं। जीवन की क्षण भंगुरता में यही ध्वनि मेरी स्थायी मित्र होंगी।

(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

Hriday Narayan Dixit

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