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Tuesday, 21 Jun 2022 18:30 pm
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामले में अदालतों से आशा की जाती है कि वे मामले के मेरिट को ध्यान में रखते हुए जल्द से जल्द आदेश पारित करें। शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के दो जून के आदेश के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणी  की। शीर्ष अदालत ने आगे कहा कि अग्रिम जमानत मांगने वाले आवेदन को दो महीने के बाद टालने की सराहना नहीं की जा सकती है।

जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस सुधांशु धूलिया की अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता की शिकायत यह है कि हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए उसका आवेदन बिना किसी अंतरिम संरक्षण के 31 अगस्त के लिए रख दिया गया। हमारा विचार है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामले में अदालत से अपेक्षा की जाती है कि वह मामले के मेरिट को ध्यान में रखते हुए किसी न किसी तरह से जल्द से जल्द आदेश पारित करे।


शीर्ष अदालत ने पाया कि 24 मई को आवेदन दिया गया था और हाईकोर्ट से अनुरोध किया गया था कि वह अग्रिम जमानत की याचिका का निपटारा उसके मेरिट के आधार पर और कानून के अनुसार ग्रीष्मावकाश के बाद कोर्ट खुलने के तीन हफ्ते के भीतर किया जाए। यदि किसी कारणवश निर्धारित समय के भीतर मुख्य आवेदन का निपटारा नहीं किया जा सके तो आवेदन में मांगी गई अंतरिम राहत का मेरिट के आधार पर विचार किया जाना चाहिए। पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि तब तक के लिए हम याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण प्रदान करते हैं।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश आदि के तहत दर्ज मामले में अग्रिम जमानत मांगी थी। दो जून को हाईकोर्ट ने याचिका पर नोटिस तो जारी किया लेकिन राज्य की ओर से पेश वकील द्वारा स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के लिए समय मांगने के बाद मामले को 31 अगस्त को सूचीबद्ध कर दिया था।