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-2012 में भाजपा का प्रदर्शन संवारकर अपनी सीट हार गए थे खंडूरी भी -बंगाल में हिट प्रशांत किशोर 2017 में उत्तराखंड में हो गए थे विफल देहरादून, 03 मई (हि.स.)। पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों से सभी को 2012 का उत्तराखंड विधानसभा चुनाव और भाजपा के सीएम चेहरे भुवन चंद्र खंडूरी याद आ गए हैं। तब भाजपा का प्रदर्शन अपने बूते काफी हद तक संवारकर खंडूरी खुद कोटद्वार विधानसभा सीट पर अपना चुनाव हार गए थे। शुभेंदु अधिकारी की तरह तब अपने क्षेत्र के दिग्गज के तौर पर सुरेंद्र सिंह नेगी को एक नई पहचान मिली थी। पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों के बाद ममता के प्रमुख रणनीतिकार प्रशांत किशोर को भी याद किया जा रहा है, जो 2017 में उत्तराखंड की चुनावी राजनीति को भांपने में बुरी तरह फेल हो गए थे। 2012 में खंडूरी और 2021 में ममता बनर्जी की स्थिति में कुछ हद तक समानता के बावजूद बड़ा अंतर भी है। नंदीग्राम से चुनाव हारने के बावजूद ममता अपनी तृृणमूूल कांग्रेस की शानदार ढंग से सत्ता में वापसी कराने में सफल रही हैं। खंडूरी इस मामले में जरा सा चूक गए थे। दरअसल, 2012 का विधानसभा चुनाव भाजपा ने खंडूरी है, जरूरी स्लोगन के साथ लड़ा था। इस चुनाव में भाजपा ने सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को अपना प्रमुख चेहरा घोषित किया था। सारा चुनाव खंडूरी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करते हुए भाजपा ने लड़ा था। इस चुनाव से पहले प्रदेश में पांच साल भाजपा की सरकार रह चुकी थी और माना जा रहा था कि एंटी इनकमबेंसी के चलते भाजपा का सूपड़ा साफ हो जाएगा, लेकिन दिल्ली में अन्ना हजारे के आंदोलन की रोशनी में खंडूरी की ईमानदार छवि पर भाजपा ने भरोसा किया। सत्तासीन होने के बावजूद भाजपा 70 सदस्यीय विधानसभा मेें अपने 31 विधायकों के साथ सामने आई, जबकि मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के केवल 32 विधायक जीतकर आए। एक सीट के अंतर से सबसे बड़ी पार्टी बनी कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका मिला, तो निर्दलीयों की सहायता से उसने सरकार बना दी। इन स्थितियों के बीच, यह खंडूरी का ही नाम था, कि भाजपा ने उम्मीद से कहीं ज्यादा बेहतर प्रदर्शन किया, हालांकि कोटद्वार सीट पर भुवन चंद्र खंडूरी अपना चुनाव हार गए थे।पश्चिम बंगाल के चुनाव में रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सफलता की कहानी और भाजपा के संबंध में सटीक साबित हुई उनकी भविष्यवाणी के बीच सभी को 2017 का चुनाव याद आ रहा है। इस विधानसभा चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कांग्रेस की नैया पार लगाने के लिए प्रशांत किशोर की सहायता ली थी। प्रशांत किशोर ने खूब मेहनत भी की थी, लेकिन चुनाव के नतीजों में कांग्रेस की बुरी गत सामने आई थी। कांग्रेस को सिर्फ 11 सीटें हासिल हुई थीं और भाजपा ने 58 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत प्राप्त किया था।
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