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बाबा की नगरी आदि शक्ति की आराधना में लीन, शैलपुत्री के दरबार में आस्था का सैलाब

 

वाराणसी, 10 अक्टूबर(हि.स.)। शारदीय नवरात्र के पहले दिन बुधवार को बाबा विश्वनाथ की नगरी आदि शक्ति भगवती शैलपुत्री के प्रति विनयवत भाव से नतमस्तक रही। आधी रात के बाद से ही तन मन उल्लासित होकर उनके प्रति श्रद्धा का भाव हिलोरें मारता रहा। मां के दरबार में संतति वृद्धि,श्री समृद्धि,अखण्ड सौभाग्य की कामना लेकर हाजिरी लगाने के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पडा। कड़ी सुरक्षा के बीच बैरिकेडिंग में कतारबद्ध श्रद्धालु अपनी बारी के इन्तजार में मां का गगनभेदी जयकारा लगाता रहे। 
इस दौरान भगवती के अलईपुर स्थित दरबार और आसपास मेले जैसा दृश्य हैं। मंदिर के आस-पास पूजा साम्रगी,नारियल चुनरी अड़हुल की अस्थायी दुकानों पर महिलाओं की भीड़ पूजन सामग्री खरीदने के लिए जुटी थी। 
शारदीय नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री के दर्शन की धार्मिक मान्यता हैं। पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रुप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था। हिमालय शक्ति-दृढ़ता-आधार व स्थिरता का प्रतीक है। मां शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है। माना जाता है कि मां दुर्गा ने देवासुर संग्राम में प्रथम दिन शैलपुत्री का रूप धारण कर असुरों का संहार किया था। भगवती का वाहन वृषभ, दाहिने हाथ में त्रिशूल और बायें हाथ में कमल सुशोभित है। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में प्रकट हुई थीं। तब इनका नाम सती था। इनका विवाह भगवान शंकर से हुआ था। एक बार वह अपने पिता के यज्ञ में गई तो वहां अपने पति भगवान शंकर के अपमान को सह न सकीं। उन्होंने वहीं अपने शरीर को योगाग्नि में भस्म कर दिया।अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और शैलपुत्री नाम से पूजनीय व वंदनीय हुई। इस जन्म में भी शैलपुत्री देवी शिवजी की ही अर्धागिनी बनीं। शैलपुत्री मां अनन्त शक्तियों की स्वामिनी है। योगी और श्रेष्ठ साधक नवरात्र के पहले दिन माता के इस स्वरूप की उपासना करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना प्रारम्भ होती है।
ओम जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा, क्षमा शिवा धात्री स्व स्वध: नमस्तुते
नवरात्र के पहले दिन नौ दिन तक आदि शक्ति के भक्ति और आराधना का संकल्प लेकर (अभिजीत मुहुर्त) में कलश स्थापना किया गया। घरों और देवी मंदिरो में अलसुबह से ही दुर्गा चालिसा स्तुति,सप्तसदी,चण्डी पाठ,आरती के मंत्र फिजाओं में गूंजने लगे। सूर्य की पहली उजास किरणों के लालिमा में देवी के जयकारा और घंट घड़ियाल बजने ,चंहुओर धूप अगरबत्ती,हवन से निकलने वाले घुएंसे पूरा माहौल आध्यात्मिक हो गया।
नवरात्र के लिए पहले दिन शैलपुत्री के साथ दुर्गाकुण्ड स्थित भगवती कूष्माण्डा, महालक्ष्मी मंदिर लक्ष्मीकुण्ड लक्सा,सहित सभी प्रमुख और छोटे बड़े मंदिरो में लंबी कतार मध्यरात्रि के बाद ही लग गई। नारियल, चुनरी लेकर मां को अर्पित करने के लिए रेला उमड़ पड़ा। 

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