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मां दंतेश्वरी मंदिर में स्थापित हैं तेरहवीं शताब्दी की गणेश प्रतिमाएं

 

दंतेवाड़ा, 13 सितंबर (हि.स.)। आदि शक्ति मां दंतेश्वरी मंदिर में तेरहवीं शताब्दी की भगवान गणेश प्रतिमा स्थापित हैं। पत्थर निर्मित इस प्रतिमा की स्थापना राजा अन्नमदेव ने की थी। इसके अलावा देवों में सबसे पहले पूजे जाने वाले भगवान गणेश की दर्जन भर छोटी प्रतिमाएं मंदिर में स्थापित हैं, जो मंदिर के आसपास यत्र-तत्र या खुदाई के दौरान मिली हैं। 
इधर, बाणासूर की राजधानी रही बारसूर में देश की दूसरी बड़ी गणेश प्रतिमा स्थापित है। पर्यटन नगरी में विराजे विघ्र विनाशक की युगल प्रतिमाएं बलुआ पत्थर से तराशी गई है, जो लगभग साढ़े सात फीट व साढ़े पांच फीट ऊंची हैं। देवताओं में प्रथम पूज्य के नाम से प्रसिद्ध लम्बोदर की बारसूर स्थित युगल प्रतिमाओं के प्रति भक्तों की गहरी अास्था रही है। जानकारों की माने तो पौराणिक काल की गाथा अपने में समाहित किए हुए लंबोदर की युगल प्रतिमाआें को दक्षिण मुखी बनाया जाना इस बात का द्योतक है कि विघ्न विनाशक अपने भक्तों पर पड़ने वाली विघ्नों का नाश करने में सक्षम हैं। लंबोदर को नागपाश का जनेऊ धारण करवाया गया है एवं बाएं हाथ में नागअस्त्र शोभित है, जो भक्तों के कष्टों को हरने का प्रतीक है।
मां दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी जिया के मुताबिक पत्थर में तराशे गए लगभग पांच फीट के भगवान गणेश के अलावा मंदिर में स्थापित दर्जन भर छोटी प्रतिमाएं 13वीं शताब्दी की हैं, जो मंदिर के आसपास यत्र-तत्र पड़े थे या खुदाई के दौरान मिले थे। जानकारों के अनुसार राजा अन्नमदेव ने इन प्रतिमाओं को स्थापित किया था। उन्होंने बताया कि बारसूर में युगल प्रतिमाएं हैं, जो देश की दूसरी बड़ी प्रतिमा है। बीजापुर जिले के भैरमगढ़ में स्थापित लंबोदर की प्रतिमा के अलावा मंदिर में स्थापित गणेश प्रतिमा इस इलाके में तीसरी बड़ी प्रतिमा है।
एक ही पत्थर में शिव परिवार
पुजारी ने बताया कि भैरवबाबा मंदिर में स्थापित एक ही पत्थर में भगवान भोलेनाथ का पूरा परिवार है। शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, भैरव व नंदी की प्रतिमा तराशी गई है।