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मदस विश्वविद्यालय में विश्वस्तरीय वेद अध्ययन केन्द्र की स्थापना हो: लखावत

 महर्षि दयानन्द का जीवन भारतीय स्वतन्त्रता का प्रेरणास्रोत रहा है। जहां एक ओर उन्होंने उदयपुर के पूर्व महाराजा के जीवन में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया वहीं गोविंद गुरू के माध्यम से संपूर्ण वनवासी क्षेत्र में ज्ञान की अविरल धारा प्रवाहित की। महर्षि दयानन्द सरस्वती के नाम पर अजमेर में स्थापित विश्वविद्यालय में आजादी के अमृत काल में विश्वस्तरीय वेद अध्ययन केन्द्र की स्थापना होना आज समय की मांग है। पाश्चात्य संस्कृति ने जहां हमें जड़ों से काटने का कार्य किया है वहीं वेदाध्ययन से हमारी जड़ें मजबूत होती है। वेद पुस्तकालय की शोभा बढ़ाने के निमित्त न हों बल्कि उन पर गहन शोधकार्य किया जाना आवश्यक है।

राजस्थान विरासत संरक्षण एवं संवर्द्धन प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत ने यह विचार सोमवार को व्यक्त किए। वे परोपकारिणी सभा, महर्षि दयानन्द शोधपीठ एवं महर्षि दयानन्द सरस्वती यूजीसी चेयर के संयुक्त तत्वावधान में महर्षि दयानन्द के 200वें जन्मजयन्ती वर्ष में मनाए जा रहे कार्यक्रमों के अवसर पर आयोजित सात दिवसीय वैदिक-स्वर संधान कार्यशाला के उद्घाटन के अवसर पर बोल रहे थे।

उन्होंने कुलपति प्रो. अनिल कुमार शुक्ला ने आह्वान करते हुए कहा कि यदि वे विश्वविद्यालय में वैदिक अध्ययन केन्द्र खोलने का विचार करते हैं तो भारत की समस्त शक्तियां इस कार्य में तन, मन एवं धन से इस कार्य को पूर्ण करने में सहयोगी बनेंगी। इस अवसर पर आशीर्वचन प्रदान करते हुए परोपकारिणी सभा अजमेर के मंत्री मुनि सत्यजित आर्य ने कहा कि वेद के द्वारा सीधे परमेश्वर से जुड़ा जा सकता है। वैदिक स्वरों के सम्यक् उच्चारण से यह मार्ग और स्पष्ट हो जाता है। भारतीय वैदिक परंपरा के अंतर्गत वेद रक्षार्थ वैदिक स्वरों के संधान की महती आवश्यकता है। स्वरों के साथ ही वैदिक अर्थों का ठीक ज्ञान प्राप्त करते हुए देवत्व के विकास के लिए प्रत्यनशील होना जोकि केवल वर्तमान ही नहीं आगामी जन्मों तक के विकास का मार्ग प्रशस्त करता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. अनिल कुमार शुक्ला ने कहा सभी भाषाओं की जननी संस्कृत में शिक्षण के लिए उपयुक्त शब्द नहीं मिलता है जबकि उसमेंसीखने के लिए ही प्रेरित किया जाता है। अंतर्निहित शक्तियों के जागरण ही ज्ञान है। स्वर ज्ञान से सुनने की क्षमता में भी अभिवृद्धि होती है तथा इसे और आगे बढ़ा कर ईश्वरीय ज्ञान के अनहत नाद को भी सुना और अनुभव किया जा सकता है।इससे पूर्व स्वागत उद्बोधन करते हुए महर्षि दयानन्द शोधपीठ की निदेशक प्रो. ऋतु माथुर ने बताया कि महर्षि दयानन्द शोध पीठ की स्थापना महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में वर्ष 2016 में की गई। इस शोध पीठ के तहत अब तक महर्षि दयानन्द के साहित्य से सुसज्जित एक लाईब्रेरी की स्थापना तथा महर्षि दयानन्द के जीवन एवं संदेश को प्रचारित एवं प्रसारित करने के उद्देश्य से विभिन्न संगोष्ठियों, भजन संध्या, विचार विमर्श एवं परिचर्चाओं का आयोजन किया जा चुका है। विश्वविद्यालय में महर्षि दयानन्द के सपने को साकार करने के लिए वैदिक पार्क की स्थापना करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।कार्यक्रम में कार्यशाला परिचय महर्षि दयानन्द चेयर प्रो नरेश कुमार धीमान ने दिया तथा विषय विशेषज्ञ के रूप में आचार्य रवीन्द्र ने अपना वक्तव्य दिया। पूर्व निदेशक प्रो. प्रवीण माथुर ने आगंतुकों का आभार व्यक्त किया।निदेशक प्रो. ऋतु माथुर ने बताया कि उक्त सप्तदिवसीय कार्यशाला आवासीय रूप में ऋषि उद्यान अजमेर में आहूत की जा रही है जिसका समापन आगामी 20 अगस्त को किया जाएगा ।कार्यक्रम में 12 प्रान्तों से पधारे 126 सहभागियों के साथ ही परोपकारिणी सभा के कोषाध्यक्ष सुभाष नवाल, विश्वविद्यालय से प्रो. अरविंद पारीक, प्रो. शिवदयाल सिंह, प्रो शिव प्रसाद, प्रो. भारती जैन, डाॅ. सूरज मल राव, डाॅ. लारा शर्मा, डाॅ. जयन्ती देवी सहित अधिकारी, कर्मचारी एवं छात्र उपस्थित थे।


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